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माँ से गुहार

A Lament

by Dr. Sushil Fotedar

माँ
मेरे प्यार में
कमी कहाँ रह गई
याद है
तेरे पैरों पर लेटा
मैं कैसे खिलखिला के हंसता था
उन बर्फीली रातों में
जब दुःख का कोहरा मेरी आँखों से
पिघलकर बरसता था
तुम्हारी अट्ठारह सुंदर भुजाएं
मुझे अपने मातृत्व की गोद में
समेट लेती थीं
भावावेश में कितनी बार
तेरे शरीर को चट्टानों में पूजकर
मैंने तुझे अपने समीप बुलाया है
और तुम आ भी जाती थीं
मन में एक भीनी सी
ज़रा ज़रा महकती सी
निर्दोष आस बनकर

पर अब सब टूट सा गया
तेरा साथ तो बस छूट सा गया
बुलाने पर तो तुम अब आती ही नहीं
तड़पने पर एक हल्का- सा झोंका बनकर
मेरे बालों को सहलाती भी नहीं
किस घोर पाप की यह
दर्दनाक परिणति है
मैं जानता भी नहीं
या
मेरी प्यारी सी माँ
क्या
मैं तुम्हारा बेटा ही नहीं

माँ
मेरे प्यार में
कमी कहाँ रह गई

 

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